भारत में कृषि विकास एवं भारतीय कृषि की समस्याएँ – Bhartiya Krishi

भारत में कृषि विकास (Bhartiya Krishi)

भारत में कृषि विकास : भारत की 83% से अधिक जनसंख्या कृषि जैसे प्राथमिक कार्यों में सलंग्न है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। देश के 57% भू-भाग पर कृषि कार्य किया जाता है। विश्व में उपलब्ध भूमि के केवल 12% भू-भाग पर कृषि की जाती है।

कृषि विकास की रणनीति

स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारतीय कृषि मुख्यतः जीविकोपार्जी थी, जिसके अंतर्गत किसान बड़ी मुश्किल से अपने तथा अपने परिवार के सदस्यों के लिए ही फसलें उगा सकता था और बाजार में बेचने के लिए अतिरिक्त उत्पादन बहुत कम होता था। इस अवधि में सूखा और अकाल आम घटना हुआ करती थी और लोगों को खाद्यान्नों की कमी का सामना करना पड़ता था। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के परिणामस्वरूप लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया। – स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद सरकार ने खाद्यान्नों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए कई उपाय किए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित तीन रणनीतियाँ अपनाई गई।

  • व्यापारिक फसलों के स्थान पर खाद्यान्नों की कृषि को प्रोत्साहन देना
  • कृषि गहनता को बढ़ाना।
  • कृषि योग्य बंजर तथा परती भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित करना ।

प्रारंभिक सफलता के बावजूद 1950 के दशक के अंत तक कृषि उत्पादन स्थिर हो गया। भारतीय कृषि में 1960 के दशक में आधुनिक निवेशों के साथ ही प्रौद्योगिकीय परिवर्तन होने लगे। बीजों की अधिक उपज देनेवाली किस्में, उर्वरक, मशीनीकरण, ऋण तथा विपणन सुविधाएँ इस परिवर्तन के मुख्य घटक थे। केंद्र सरकार ने 1960 में गहन क्षेत्र विकास कार्यक्रम (Intensive Area Development Programme-IADP) तथा गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (Intensive Agriculture Area Programme IAAP) आरंभ किया। इनका उद्देश्य कृषि की उपज को बढ़ाने के लिए तकनीकी ज्ञान किसानों तक पहुँचाना तथा उन्हें ऋण की सुविधाएँ उपलब्ध कराना था। गेहूँ तथा चावल के अधिक उपज देनेवाले बीज भारत में लाए गए। इन बीजों का विकास क्रमशः मैक्सिको तथा फिलीपींस में किया गया था। इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशक दवाइयों का उपयोग भी शुरू किया गया और सिंचाई की सुविधाओं में सुधार एवं उनका विकास किया गया। इन सबके संयुक्त प्रभाव को हरित क्रांति (Green Revolution) के नाम से जाना जाता है।

भारतीय कृषि की समस्याएँ

भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है। सम्पूर्ण भारत चार अलग-अलग भौतिक भागों में बटा है। इन भागों की कृषि में विविधता भी है परिणाम स्वरूप भारतीय कृषि की समस्याएँ भी विभिन्न प्रकार की है। 1960 के दशक के बाद हरित क्रांति के बाद भारतीय कृषि ने जहाँ अभूतपूर्ण उन्नति की है। इसके बावजूद भारतीय कृषि की कई समस्यायें है। जिनका संक्षिप्त वर्ण यहाँ वर्णित हैं।

अनियमित मानसून पर निर्भरता –

कृषि के संदर्भ में वर्षा तथा तापमान मुख्य पर्यावरणीय कारक हैं। भारत में अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनों द्वारा होती है जिसमें अत्यधिक स्थानिक तथा कालिक अनिश्चितता पाई जाती है। देश के अधिकांश भागों में तापमान लगभग पूरे वर्ष भर ऊँचा रहता है। ऐसी परिस्थिति में यदि पर्याप्त जल उपलब्ध हो, तो पूरे वर्ष भर फसलें उगाई जा सकती हैं। दुर्भाग्य से भारत में वर्षा केवल 3-4 माह ही होती है, जबकि मानसूनी पवनें सक्रिय रहती हैं। वर्ष का शेष भाग प्रायः सूखा ही व्यतीत होता है। इसके अतिरिक्त वर्षा की मात्रा में प्रादेशिक भिन्नता भी बहुत होती है। देश के बहुत-से भागों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती और ये भाग उपार्द्र, आधे शुष्क तथा शुष्क हैं। ऐसे क्षेत्र प्रायः सूखे से ग्रस्त रहते हैं। यदि इन क्षेत्रों में सिंचाई तथा जल संग्रहण की उचित सुविधा हो जाए, तो कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। भारत के केवल एक- तिहाई भाग को वर्षा पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। और शेष दो-तिहाई भाग को वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वर्षा ऋतु में विस्तृत क्षेत्र बाढ़ग्रस्त हो जाते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात तथा राजस्थान के शुष्क इलाकों में भी आकस्मिक बाढ़ आ जाती है। सूखा तथा बाढ़ भारतीय कृषि के जुड़वाँ संकट बने हुए हैं।

निम्न उत्पादकता-

कृषि में इतनी उन्नति होने के बावजूद भी संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस तथा जापान जैसे विकसित देशों की अपेक्षा भारत में लगभग सभी महत्वपूर्ण फसलों की उत्पादकता कम है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण भू-संसाधनों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, जिससे श्रम उत्पादकता भी बहुत कम है। देश के विस्तृत शुष्क क्षेत्रों में अधिकतर मोटे अनाज, दालें तथा तिलहन की खेती की जाती है तथा यहाँ इनकी उत्पादकता बहुत कम है।

वित्तीय संसाधनों की बाध्यताएँ तथा ऋणग्रस्तता –

आधुनिक प्रौद्योगिकी पर आधारित वर्तमान कृषि में भारी पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है, जिसे आम किसान नहीं जुटा पाते। सीमांत एवं छोटे किसानों को अधिक वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए बहुत से किसान विविध संस्थाओं तथा महाजनों से ऋण लेते हैं। कृषि से कम होती आय तथा फसलों के खराब होने से वे कर्ज के जाल में फँसते जा रहे हैं। भारी कर्ज तथा बार-बार फसलों के नष्ट होने से आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और यहाँ तक की पंजाब जैसे कृषि उन्नत प्रदेशों में बहुत-से किसानों को आत्महत्या करने पर बाध्य होना पड़ा है। उपांत और छोटे किसानों के लिए वर्ष 2008 में सरकार द्वारा घोषित साठ हजार करोड़ रुपये की कर्जा माफी की घोषणा से स्थिति में कुछ सुधार होने की आशा है।

वाणिज्यीकरण का अभाव-

अधिकांश भारतीय कृषि अब भी जीविकोपार्जी है, जिसके अंतर्गत किसान द्वारा उत्पादित फसल उसके परिवार के सदस्यों के लिए ही पर्याप्त होती है और बाजार में बेचने के लिए फसल नहीं बचती। ऐसी स्थिति में कृषि का वाणिज्यीकरण नहीं हो पाता और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं होता। उपरान्त और छोटे किसान केवल खाद्यान्न ही उगाते हैं और इससे वाणिज्यिक फसलों का होता है। कुछ सिंचित क्षेत्रों में कृषि का आधुनिकीकरण तथा वाणिज्यीकरण हो रहा है।

व्यापक अल्प रोजगारी-

कृषि एक मौसमी व्यवसाय है, जिसमें रोजगार मौसमी होती है और बेरोजगारी वर्ष में 4 से 8 महीने रहती है। लोगों को रोजगार सामान्यतः फसलों की बुआई तथा कटाई के समय ही मिलता है। असिंचित क्षेत्रों में अल्प रोजगारी की समस्या अधिक गंभीर है।

भूमि सुधारों की कमी-

भूमि के असमान वितरण के कारण भारतीय किसान लम्बे समय से शोषित हैं। अंग्रेजी शासन के दौरान, तीन भू- राजस्व प्रणालियों-महालवाड़ी, रैयतवाड़ी तथा जमींदारी में से जमींदारी प्रथा किसानों के लिए सबसे अधिक शोषणकारी रही है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने स्थिति को सुधारने के लिए योजनाएँ बनाई, परन्तु कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण इन योजनाओं को पूर्णतया लागू नहीं किया जा सका।

कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण-

कृषि की त्रुटिपूर्ण पद्धति से कृषि योग्य भूमि के निम्नीकरण जैसी समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। सिंचित क्षेत्रों, विशेषतया नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्रों में अति सिंचाई के कारण जलाक्रांतता, लवणता, मृदा क्षारता आदि जैसी समस्याएँ पैदा हो जाती हैं, जिनके कारण से भूमि का एक बड़ा भाग बंजर हो चुका है। अभी तक लवणता व क्षारता से लगभग 80 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित हो चुकी है। देश की अन्य 70 लाख हेक्टेयर भूमि जलाक्रांतता के कारण अपनी उर्वरकता खो चुकी है।एक अन्य गंभीर समस्या कीटनाशक रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से पैदा हो गई है। इन रसायनों प्रयोग फसलों को कीड़े-मकोड़ों तथा बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है । जब इनका प्रयोग सीमित मात्रा से अधिक होता है, तो मृदा परिच्छेदिका में जहरीले तत्वों का सांद्रण हो जाता है और मृदा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

छोटे खेत तथा विखंडित जोत-

समय बीतने के साथ पीढ़ियों के अनुसार भूमि का बँटवारा होता है और जोतों का उपविभाजन तथा छितराव होता रहता है। छोटे तथा बिखरे हुए खेत कृषि के आधुनिकरण तथा विकास में बाधा बनते हैं । 1961-62 में कुल जोतों में से 52% जोतें सीमांत आकार में (दो हेक्टेयर से कम) और छोटी थीं। 1990-91 में कुल जोतों में छोटी जोतों का प्रतिशत बढ़कर 78% हो गया। 60 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास एक हेक्टेयर से छोटे भूजोत हैं लगभग 40 प्रतिशत किसानों के जोतों का आकार तो 0.5 हेक्टेयर से भी कम है। बढ़ती जनसंख्या के कारण इन जोतों का औसत आकार और भी सिकुड़ रहा है। चकबंदी के लिए विशेष प्रयास नहीं किए गए कुछ राज्यों में तो एक बार भी चकबंदी नहीं हुई है । वे राज्य जहाँ एक बार चकबंदी हो चुकी है, वहाँ पुन: चकबंदी की आवश्यकता है, क्योंकि अगली पीढ़ी में भूमि बँटवारे की प्रक्रिया से भूजोतों का दोबारा विखंडन हो गया है । विखंडित व छोटे भूजोत आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं हैं।

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