मृदा अपरदन किसे कहते हैं? प्रकार एवं इसे रोकने के उपाय लिखिए

मृदा अपरदन किसे कहते हैं? (Mrida Apardan Kise Kahate Hain)

मृदा अपरदन जल तथा वायु के प्रभावाधी मृदा की ऊपरी परत कटकर बह जाती है जिसे मृदा अपरदन कहते हैं मृदा अपरदन मुख्यतः वनस्पतिहीन, ढालू तथा कम ह्यूमस वाले इलाकों में अधिक होता है। प्रवाहित तल तथा वायु मृदा निर्माण तथा मृदा अपरदन के दो महत्वपूर्ण कारक हैं। मृदा निर्माण तथा मृदा अपरदन साथ-साथ होता रहता है। सामान्य परिस्थितियों में इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच एक संतुलन बना रहता है। इसका अभिप्राय यह है कि मृदा का निर्माण करने वाले कणों के निक्षेप की दर उनके अपरदन के बराबर होती है और मृदा अपने स्थान पर सुरक्षित रहती है।

परंतु कई बार प्राकृतिक शक्तियों के प्रभाव से या मानवीय क्रियाओं द्वारा यह संतुलन बिगड़ जाता है और मृदा अपरदन की क्रिया आरंभ हो जाती है। मृदा अपरदन मुख्यतः मनुष्य के अवांछित क्रियाकलापों, जैसे- वनों का अन्धाधुन्ध काटना, पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई कराना तथा अवैज्ञानिक ढंग से कृषि करना आदि कारणों से होता है। अति चराई से मृदा अपरदन की गति तेज हो जाती है। जनसंख्या में वृद्धि होने से भूमि की माँग बढ़ जाती है और वनों तथा अन्य प्राकृतिक वनस्पति को काट दिया जाता है जिससे मृदा का अपरदन वाली शक्तियों का प्रभाव बढ़ जाता है।

बहते हुए जल, पवन, जीव-जन्तुओं एवं मनुष्यों की क्रियाओं द्वारा भू-पटल की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी की परत के कट जाने, बह जाने और उड़कर अन्यत्र स्थानान्तरित हो जाने को मृदा अपरदन या भू-क्षरण या भूमि का कटाव कहते हैं। मिट्टी के कटाव से शनै: शनै: भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है और वह कृषि के लिए सर्वथा अयोग्य हो जाती है। इसलिए इसे ‘रेंगती हुई मृत्यु’ कहते हैं ।

भारत का लगभग एक चौथाई भाग मृदा अपरदन से पीड़ित है । यह समस्या पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में अधिक प्रबल है।

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मृदा अपरदन के प्रकार

मृदा अपरदन के प्रकार- मृदा अपरदन के दो प्रकार हैं-

1. परतदार अपरदन (Layer or Sheet Erosion )

जब मृदा की ऊपरी परत जल बहा ले जाए अथवा वायु उड़ा ले जाए तो उसको परतदार अपरदन कहते हैं।

2. नालीदार अपरदन (Gully Erosion )

तीव्र ढाल तथा भारी वर्षा वाले प्रदेशों में बहता हुआ जल कटाव करके नालियाँ बना लेती है, तो इसे नालीदार अपरदन कहते हैं। मृदा अपरदन के कारण-

  • भारत 175% वर्षा केवल जुलाई तथा अगस्त में हो जाती है। यह वर्षा मूसलाधार तथा बौछारों के रूप में होती है। फलतः मिट्टी का कटाव वर्षा की वेगवती बूँदों के पड़ने एवं जल के तीव्र बहाव से सम्पन्न होता है।
  • नवीन कृषि भूमि प्राप्ति हेतु वनों को साफ कर दिया गया, जिससे भूमि अपरदन के लिए खुली और जड़ों की जकड़न से मुक्त हो गयी।
  • भारत कुछ भागों में स्थानांतरी (झूमिंग) कृषि की है, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है, क्योंकि इसके लिए वृक्षों व झाड़ियों को जलाकर साफ कर दिया जाता है।
  • पहाड़ी ढलानों पर बिना विशेष सावधानियों को अपनाये, कृषि करना ।
  • अति पशुचारण।
  • वर्षा ऋतु के पूर्व मरुस्थलीय क्षेत्रों में गरम आँधियाँ चलती हैं जो भूमि की ऊपरी परत को ढीली मिट्टी को उड़ा ले जाती है राजस्थान, गुजरात, हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश में निरंतर उपजाऊ मिट्टी का क्षरण होता रहता है।
  • अवैज्ञानिक विधि से कृषि करने से कृषक स्वयं मिट्टी के कटाव को बढ़ाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में ढाल के अनुरूप समोच्च रेखाओं के अनुरूप जुताई न करने से तथा दोषयुक्त फसल चक्र अपनाकर मिट्टी के कटाव को बढ़ाते हैं।

मृदा अपरदन के उपाय

मृदा संरक्षण हमारे देश में मृदा अपरदन की गम्भीर समस्या बन गई है। ऐसी परिस्थिति में मृदा का संरक्षण अति आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए जाते हैं-

1. वृक्षारोपण

मृदा अपरदन को रोकने का सबसे अच्छा उपाय वृक्षारोपण है। जिन प्रदेशों में मृदा अपरदन की समस्या गम्भीर हो गई है, वहाँ नए पेड़ की कतारें लगाई जाएँ। जिन प्रदेशों में वन हैं, उन्हें अन्धाधुन्ध काटने तथा उनका दुरूपयोग करने पर रोक लगाई जाए। हरियाणा, राजस्थान तथा गुजरात में मृदा अपरदन को रोकने के लिए पेड़ों की कतारें लगाई गई हैं। ये पेड़ अपरदन करने वाली तेज हवाओं के रास्ते में रूकावट पैदा करते हैं और मृदा को अपरदन से बचाते हैं। केन्द्रीय शुष्क भूमि अनुसंधान संस्थान ने पश्चिमी राजस्थान में बालू टीलों को स्थिर करने के प्रयोग किए हैं।

2. बाँध बनाना

जब वर्षा के दिनों में नदी में बाढ़ आती है तो बहुत-सी मृदा जल के साथ बह जाती है। इसे रोकने के लिए बाँध बनाने की आवश्यकता होती है। इससे जल के वेग में कमी आती है और मृदा अपरदन रूक जाता है। इसके अतिरिक्त शुष्क मौसम में बाँधों से नहरों द्वारा सिंचाई भी की जाती है।

5. पशु चारण पर प्रतिबन्ध

पशु चारण के लिए अलग चरागाहों की व्यवस्था होनी चाहिए। खाली खेतों में पशु बिना किसी रोक-टोक के घूमते हैं और अपने खुरों से मृदा को ढीला कर देते हैं। इससे वर्षा तथा वायु के लिए मृदा अपरदन हो जाता है। घास के मैदानों में भी पशु चारण सीमित तथा नियन्त्रित रूप से होना चाहिए।

4. कृषि प्रणाली में सुधार

कृषि प्रणाली में सुधार करके मृदा अपरदन को काफी हद तक रोका जा सकता है। इनमें फसलों का चक्रण (Crop Rotation), सीढ़ीदार कृषि तथा ढालों पर समोच्च रेखीय जुताई करना आदि उपाय है। समोच्च रेखीय जुताई से धरातलीय जल प्रवाह को कम करने तथा मृदा को अपरदन से बचाने में बहुत सहायता मिलती है। इस जुताई में खेत को ढाल की लम्बवत् दिशा में समोच्च रेखाओं के साथ-साथ जोता जाता है। और ढाल की दिशा में जुताई नहीं की जाती। ऊपर से देखने पर जोता हुआ खेत एक समोच्च रेखा मानचित्र की भाँति दिखाई देता है। इससे वर्षा तथा सिंचाई के जल का प्रवाह कम करने में सहायता मिलती है और मृदा अपरदन पर नियन्त्रण पाया जाता है। स्थानान्तरी कृषि (झूम कृषि)

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