पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई? आरंभिक एवं आधुनिक सिद्धांत – Prithvi Ki Utpatti

पृथ्वी, विशाल ब्रह्मांडीय महासागर में हमारा हल्का नीला बिंदु, एक उल्लेखनीय खगोलीय पिंड है। इसकी उत्पत्ति एक ऐसी कहानी है जो अरबों वर्षों में सामने आती है, जिसमें ब्रह्मांडीय घटनाएं, आकाशीय टकराव और ब्रह्मांड में कणों और बलों का धीमा नृत्य शामिल है। इस ब्लॉग में, हम पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई? एवं उसके आरंभिक एवं आधुनिक सिद्धांत के बारे में आपको विस्तार से बताएंगे!

पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई?

पृथ्वी की उत्पत्ति का आरंभिक सिद्धांत

Prithvi Ki Utpatti पृथ्वी के उद्भव की कहानी बड़ी विचित्र है। संसार के विद्वानों ने अलग-अलग तरह से पृथ्वी के जन्म की कहानी अपने ढंग से प्रस्तुत की है। हमारे देश में भी पुराणों में पृथ्वी के जन्म की कहानी को बड़े मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। प्राचीन (रोम, यूनान, अरब) काल से अनेक दार्शनिकों व वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की उत्पत्ति के रहस्य को जानने एवं समझने का प्रयास किया है, यह बात अलग है कि संसार के विद्वान अभी तक किसी एक निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सके हैं। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के संदर्भ में सर्वप्रथम जर्मन वैज्ञानिक, नीतिशास्त्री एवं दार्शनिक इमानुएल कांट (Immanuel Kant 1724-1804) थे। कांट के मत को आधार मानते हुए संक्षिप्त संशोधन के पश्चात् फ्रांस के महान गणितज्ञ, भौतिक-शास्त्री तथा खगोलविद् पियेर लाप्लास (Pierre Simon Laplace 1749-1827) ने निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis 1796 ई.) को प्रस्तुत किया। इस परिकल्पना का लाप्लास महोदय के अपनी पुस्तक ब्रह्मांड व्यवस्था का प्रतिपादन (Exposition of World System) में विस्तार से प्रकट किया। इस सिद्धांत में सौरमंडल की उत्पत्ति का आधार निहारिका को बताया। इसलिए सिद्धांत को निहारिका सिद्धांत भी कहते हैं। लाप्लास के अनुसार अतीत में ब्रह्मांड में एक विशालकाय निहारिका भ्रमणशील अवस्था में थी । निरंतर घूमते इस निहारिका में विकिरण से ऊपरी भाग ठण्डा होने लगा तथा सिकुड़ कर कम गतिशील होने लगा। केन्द्रीय निहारिका एवं निहारिका के ऊपरी परत में गति का अंतर आने लगा, तथा आयतन में भिन्नता के चलते कालान्तर में मुख्य निहारिका से एक छल्लानुमा निहारिका का ऊपरी भाग अलग हो गया।

इस छल्ला अथवा सिकुड़कर अलग हुए गाँठ को लाप्लास ने उसे उष्ण गैसी पुँज या ग्रन्थी कहा । इस प्रकार के नौ छल्ला निहारिका से निकले (जो बाद में आलोचना का आधार बने) और नौ ग्रहों को जन्म दिया। इसी क्रम में सन् 1904 में चेम्बरलीन एवं मोल्टन (Chamberlin and Moulton) ने ग्रहाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया। चेम्बरलीन एवं मोल्टन दो अमेरीकी भूगोलवेत्ता थे। इस सिद्धांत का मूल उद्देश्य निहारिकी परिकल्पना से हटकर सौरमण्डल एवं पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंधी नयी विचारधारा रखना था। इनके अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मांड में सूर्य के निकट से एक तारा गुजरा इस तारे का मार्ग सूर्य की दिशा से विपरीत था। जब यह तारा सूर्य के पास से गुजरा तो सूर्य पर ज्वार आने से उसका कुछ भाग तारे की ओर

आकर्षित हुआ तथा आकर्षित पदार्थ दोनों तारों (सूर्य एवं तारा) के मध्य ब्रह्माण्ड में इस तरह ग्रहाणुओं के रूप में बिखर गया। तारे के सूर्य से दूर चले जाने के पश्चात् ग्रहाणु आपस में टकराकर व घर्षण से उष्ण होते गए। इनके नाभिक केन्द्रीय भाग के निकट एकत्रित होते गए। इससे भाँति केन्द्रीय पदार्थों का भार एवं ताप भी बढ़ा। इस आकर्षण विधि से एकत्रित पदार्थों भौतिकी के नियमानुसार छोटे-बड़े ग्रह बने । इन्हीं ग्रहों से सौरमंडल की उत्पत्ति हुई । इसी क्रम में पहले सन् 1919 में जेम्स (Sir James), जीन्स (Jeans) और बाद में सन् 1928 में जैफ्रे (Sir Harold Jeffrey) ने इस मत का समर्थन किया। यद्यपि कुछ समय के बाद के तर्क सूर्य के साथ एक और साथी तारे के होने की बात मानते हैं । ये तर्क द्वैतारक सिद्धांत (Binary Theories) के नाम से जाना जाता है। रूसी नक्षत्रवेत्ता ऑटो. जे. शिमिड (Otto. J. Schmid ) व जर्मन के कार्ल वाइजास्कर ( Carl Weizascar) ने सन् 1950 में निहारिका परिकल्पना में कुछ संशोधन किया जो पूर्व परिकल्पनाओं से भिन्न था। ऑटो. जे. शिमिड की अन्तरतारकीय धूल परिकल्पना सिद्धांत (Cosmic Dust theory) को पर्याप्त मान्यता मिली है, क्योंकि इनमें ग्रहों व उपग्रहों के निर्माण में ऐसे पदार्थों की व्यवस्था को आधार माना जो आज भी ब्रह्मांड में पाए जाते हैं। शिमिड के विचार से सूर्य एक सौर निहारिका से घिरा हुआ था जो मुख्यत: हाइड्रोजन, हीलियम और धूलकणों की बनी थी। इन कणों के घर्षण व टकराने (Collision) से एक चपटी तश्तरी की आकृति के बादल का निर्माण हुआ और अभिवृद्धि (Accretion) प्रक्रम द्वारा ही ग्रहों को समझने को मौका मिला। वाइजास्कर ने सूर्य की रचना कॉस्मिक धूल (Cosmic Dust) से मानी है।

पृथ्वी की उत्पत्ति का आधुनिक सिद्धांत

आधुनिक सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति (The Big Bang Theory) ब्रह्मांड की उत्पत्ति संबंधी आधुनिक समय में सर्वमान्य सिद्धांत महाविस्फोट का सिद्धांत / बिग बैंग सिद्धांत (Big bang theory) है। इसे विस्तरित ब्रह्मांड परिकल्पना (Expanding universe hypothesis) भी कहा जाता है। सन् 1920 ई. में एडविन हब्बल (Edwin Hubble) वैज्ञानिक ने प्रमाण दिए कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। समय बीतने के साथ-साथ आकाशगंगाएँ एक-दूसरे से दूर हो रही हैं। ब्रह्मांड विस्तार को एक गुब्बारे पर कुछ निशान लगाकर जिनको आकाशगंगाएँ मानकर इस गुब्बारे को फुलाया गुब्बारे को फुलाने पर उस पर लगे निशान बड़े होकर फैलने लगे। दो निशानों के मध्य बढ़ते अंतर के माध्यम से ब्रह्मांड विस्तारता को समझाने का प्रयास किया गया। वैज्ञानिक मानते हैं कि आकाशगंगाओं के बीच की दूरी बढ़ रही है, जबकि गुब्बारे का फैलाव यह तथ्य के अनुरूप नहीं है। प्रक्षेण आकाशगंगाओं के विस्तार को सिद्ध करने में सफल रहा। गुब्बारे का उदाहरण आंशिक रूप से ही मान्य है । महाविस्फोट का सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संदर्भ में सबसे ज्यादा मान्य है। यह सिद्धांत व्याख्या करता है कि कैसे आज से लगभग 13.7 खरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक बिन्दु से हुई थी। इस सिद्धांत की सहायता से जार्ज गैमो ने सन् 1948 में ब्रह्मांडीय सूक्ष्म तरंग विकिरण (cosmic microwave background radiation & CMB) की भविष्यवाणी की थी, जिसे सन् 1960 में ‘खोज लिया गया था। इस खोज ने महा-विस्फोट के सिद्धांत को एक ठोस आधार प्रदान किया। महा-विस्फोट का सिद्धांत अनुमान और निरीक्षण के आधार पर रचा गया है। खगोल शास्त्रियों का निरीक्षण था कि अधिकतर निहारिकाएँ (Nebulae) पृथ्वी से दूर जा रही है ।

बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है

  1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म एवं तथा घनत्व अनंत था। जो अति छोटे गोलक (एकांकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। इससे ब्रह्मांड बना है ।
  2. वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी। ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। ब्रह्मांड निर्माण संबंधी बिग बैंग की प्रक्रिया में अति छोटे गोलक में विस्फोट (Bang) हुआ, इस की प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सैकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरंभिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ ।
  3. बिग बैंग से 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणु पदार्थ का निर्माण हुआ । ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया।

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